जिम्मेदार कौन?
ईश्वर और प्रकृति दोनों मीमांसा का विषय हैं। लेकिन दोनों में बड़ा स्पष्ट अंतर सामान्य व्यक्ति को भी आभास होता है। ईश्वरीय अस्तित्व प्रत्यक्ष या परोक्ष का विषय हो सकता है ।आस्था - अनास्था का विषय हो सकता है । आस्तिक - नास्तिक होने का विषय हो सकता है। परंतु प्रकृति प्रत्यक्ष होती है । न केवल व्यक्ति वरन कोई भी जीव इस पर प्रश्न नहीं उठा सकता है । इसके अस्तित्व का किसी आस्था , विश्वास या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है। इसी कारण सबसे ऊपर प्राकृतिक अस्तित्व होता है। अपनी धारणाओं में मनुष्य ने इसीलिए शायद प्राकृतिक सिद्धांत को और प्राकृतिक न्याय को हमेशा तार्किक ढंग से ऊपर रखा है । विद्वानों के एक समूह में यह धारणा भी है कि समस्त तत्व प्रकृति में ही विद्यमान हैं। इससे परे चेतन - अचेतन का अपना आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व हो सकता है। परंतु प्रकृतिवादियों की एक चुनौती उन सभी धर्म गुरुओं और वैज्ञानिकों...