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याद तुम्हें करता हूँ मैं

बयाँ करूँ कैसे ? याद तुम्हें करता हूँ मैं चंदा तारों से रंग चुराकर अपनी दवात में भरता हूँ मैं, रात रात भर जाग जाग कर आसमान के कैनवास पर तस्वीर तुम्हारी रंगता हूँ मैं। बयाँ करूँ कैसे? याद तुम्हें करता हूँ मैं।। काली रातों में रंग बिरंगे सपने तरह तरह के न जाने कितने कभी  उदधि की लहरों के जैसे लहरों को चूमती हवा के जैसे मिलके बिछड़न का अनुभव करता हूँ मैं।। बयाँ करूँ कैसे ? याद तुम्हें करता हूँ मैं।। जाती सर्दी की नर्म हवाएं और बसंती धूप कैसे हो सकती है आखिर स्मृतियों से ऐसी चूक पुष्पकली पर भौंरा बन गुनगुन गुनगुन करता हूँ मैं। बयाँ करूँ कैसे? याद तुम्हें करता हूँ मैं।।

तो कितना अच्छा होता

काश के तुम न जाते तो कितना अच्छा होता पल दो पल और ठहर जाते तो कितना अच्छा होता, चलो खैर जब चले गए तो अब कोई बात नहीं लेकिन हम फिर मिल पाते तो कितना अच्छा होता।। सोचता है स्मृतियों से पलटते हुए जिंदगी के पन्ने फिर से  नन्हें मुन्ने बन जाते तो कितना अच्छा होता बेफिक्री की फिक्र नहीं थी जिसकी फ़िक्र अब होती है काश के फिर से बेफिक्र हो पाते तो कितना अच्छा होता। लुत्फ़ उठाने के चक्कर में हर दर से आगे बढ़ते आये काश के अपनी दर पे रुक जाते तो कितना अच्छा होता छोड़ के जिनको बेकद्री से हद के पार निकल आये फिर उन्हें कद्र से रख पाते तो कितना अच्छा होता।। जीवन के हर चरणों से गुजरे तो जाके ये जान सके पहले यदि इससे हो जाते परिचित तो कितना अच्छा होता हर हाल का कुछ हल होता है, होते हैं सबसे अंजान भले पहले जो ये समझा पाते तो जीवन कितना अच्छा होता।।