याद तुम्हें करता हूँ मैं
बयाँ करूँ कैसे ? याद तुम्हें करता हूँ मैं चंदा तारों से रंग चुराकर अपनी दवात में भरता हूँ मैं, रात रात भर जाग जाग कर आसमान के कैनवास पर तस्वीर तुम्हारी रंगता हूँ मैं। बयाँ करूँ कैसे? याद तुम्हें करता हूँ मैं।। काली रातों में रंग बिरंगे सपने तरह तरह के न जाने कितने कभी उदधि की लहरों के जैसे लहरों को चूमती हवा के जैसे मिलके बिछड़न का अनुभव करता हूँ मैं।। बयाँ करूँ कैसे ? याद तुम्हें करता हूँ मैं।। जाती सर्दी की नर्म हवाएं और बसंती धूप कैसे हो सकती है आखिर स्मृतियों से ऐसी चूक पुष्पकली पर भौंरा बन गुनगुन गुनगुन करता हूँ मैं। बयाँ करूँ कैसे? याद तुम्हें करता हूँ मैं।।