न कि जीवन से ज्यादा हो
कुछ उम्मीदें तुम हमसे रखो कुछ आशाएं हम तुमसे रखें लेकिन जिसकी अपनी मर्यादा हो | जीवंत करे जो जीवन को न कि जीवन से ज्यादा हो | गीत रखो कुछ मीत रखो एक जग अपना और अपने जगजीत रखो | जिसमें हिस्सा सबका आधा आधा हो | लेने वाले हों जिसमें सब और जिसका हर कोई दाता हो | जीवंत करे जो .......... चार जनों संग चौराहे पर कुछ लोग बाग़ कुछ अपनी चीज़ें चाय की चुस्की में काम जहाँ चुक जाता हो | कोई धन आये या न आये जहाँ पर सुख से जीवन जीना आ जाता हो | जीवंत करे जो .......... बाँध रखो हरदम बचपन को बेफिक्री और उन्मादीपन को चाहे जिस पड़ाव पर जीवन जाता हो | हम ख़ुशी में सोयें हम ख़ुशी में रोयें ख़ुशी से ऐसा तगड़ा नाता हो | जीवंत करे जो .......... बोझ लिए क्यों दबा है मन क्यों भारी-2 रूठा -2 है जीवन क्यूँ अपना अस्तित्व भुलाता है | चल तरंग ख़ुशी की उस हलचल पर जिसमें घुलमिल आनंद नहाता हो | जीवंत करे जो .......... गीत मीत बचपन बेफिक्री व नादानी जीवन सरल ...