तो कितना अच्छा होता

काश के तुम न जाते तो कितना अच्छा होता
पल दो पल और ठहर जाते तो कितना अच्छा होता,
चलो खैर जब चले गए तो अब कोई बात नहीं
लेकिन हम फिर मिल पाते तो कितना अच्छा होता।।

सोचता है स्मृतियों से पलटते हुए जिंदगी के पन्ने
फिर से  नन्हें मुन्ने बन जाते तो कितना अच्छा होता
बेफिक्री की फिक्र नहीं थी जिसकी फ़िक्र अब होती है
काश के फिर से बेफिक्र हो पाते तो कितना अच्छा होता।

लुत्फ़ उठाने के चक्कर में हर दर से आगे बढ़ते आये
काश के अपनी दर पे रुक जाते तो कितना अच्छा होता
छोड़ के जिनको बेकद्री से हद के पार निकल आये
फिर उन्हें कद्र से रख पाते तो कितना अच्छा होता।।

जीवन के हर चरणों से गुजरे तो जाके ये जान सके
पहले यदि इससे हो जाते परिचित तो कितना अच्छा होता
हर हाल का कुछ हल होता है, होते हैं सबसे अंजान भले
पहले जो ये समझा पाते तो जीवन कितना अच्छा होता।।





Comments

  1. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  2. वाह! बहुत सुंदर 👌👌

    ReplyDelete
  3. सदैव की भांति हृदय के पारदर्शी भावों को सुंदर शब्दों का स्वरूप देने में सफल रहे...!!!!🙏

    ReplyDelete
    Replies
    1. आशुतोष अवस्थी

      Delete
    2. दोस्त धन्यवाद्। काश के हम फिर मिल पाते तो कितना अच्छा होता।

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कितने आज़ाद कितने गुलाम

नींद नहीं आती है रातों में- Insomnia

साइलेंट डिस्टर्बिंग ध्वनि