सुख दुःख का पैमाना
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तर्क प्रधान जीव होने के कारण एक बड़ा साधारण सा प्रश्न मनुष्य के मस्तिष्क में जरुर आता है | सुख क्या है ? सुखी कौन है ? इसके माप का पैमाना क्या है ? कैसे अधिकतम सुख प्राप्त
किया जाए आदि आदि ? क्या जिसके पास बहुत पैसा है, वो
सुखी है ? क्या जिसके पास बड़ी-बड़ी मोटर गाड़ियाँ हैं, वो सुखी है ? जो रोज हवाई
जहाज से जब मन करे देश विदेश घूम रहा है, क्या वो बड़ा सुखी है ? क्या किसी देश का
राष्ट्राध्यक्ष बहुत सुखी है ? क्या दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपति बहुत सुखी हैं ?
ऐसे न जाने कितने अनगिनत प्रश्न लोगों के मष्तिस्क में उमड़ते घुमड़ते रहते हैं |
क्या सही है, क्या गलत है, कितना
सही है और कितना गलत है ? ये स्तर का प्रश्न
बड़ा कठिन है |
आइये इन सब बातों पर
थोड़ी मीमांसा करते हैं :
अवस्था
मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न प्रकार की
अवस्थाओं और चरणों से गुजरता है | ये अवस्थाएं और चरण कभी निश्चित नहीं होते | ये
सदैव संक्रमणीय होते हैं | अर्थात इनमें हमेशा गतिशीलता होती है | ये कभी ठहरती
नहीं हैं | इनकी प्रकृति और स्वरुप समय के साथ-साथ बदल जाते हैं | अवस्थाओं और चरणों की इस गतिशीलता की वजह
से सुख भी गतिशील होता है | इसकी भी प्रकृति और स्वरुप बदल जाया करता है | हर
अवस्था और चरण पर व्यक्ति अपनी जरुरत, क्षमता और पसंद के अनुसार इसे प्राप्त करना
चाहता है |
अवस्था के अनुसार सुख का स्वरुप
बच्चा जब जन्म लेता है तो उसके सुख का स्वरुप क्या है ?
प्रसव के दौरान जन्म
ले रहे उस बच्चे को भी माँ के साथ-साथ पीड़ा से गुजरना होता है | उस दौरान उसके सुख
का स्वरुप होता है उस दर्द से राहत मिलना | जब उसे दर्द होता है तो वह रोता है और
जब उससे उसे छुटकारा मिल जाता है तो वह शांत हो जाता है | इसीलिए तुरंत पैदा हुए
बच्चे का रोना इस बात का भी प्रतीक होता है कि बच्चा स्वस्थ है उसकी इन्द्रियां
काम कर रही है | उसका तंत्रिका तंत्र ठीक है | उसे चीजों का अहसास है और वह अनुभव
कर रहा है | अर्थात वह सुख और दुःख का अनुभव कर रहा है |
शैशवावस्था में सुख का स्वरुप
आप अक्सर देखते
होंगे कि जब छोटे से बच्चे के पास कोई व्यक्ति नहीं होता है तो वह रोने लगता है
| अँधेरा होने पर वह रोता है और लाइट जलते
ही वह चुप हो जाता है | इसलिए बच्चे के पास अक्सर लोग रोशनी रखते हैं | इस तरह ये
देखा जा सकता है कि लगभग दो साल तक के बच्चों के सुख का स्वरुप उनकी भूख, प्यास,
मल-मूत्र त्याग और पारिवारिक सदस्यों का उनके आस पास रहना, प्रकाश, मक्खी-मच्छर,
अत्यधिक सर्दी-गर्मी और से छुटकारा होता है |
फिर बच्चा जैसे जैसे
बड़ा होता है उसका शारीरिक और मानसिक विकास जैसे जैसे होता जाता है उपरोक्त के
अतिरिक्त उसके सुख की चाह, उसके रुप
बढ़ते और बदलते जाते हैं |
बाल्यावस्था में सुख का स्वरुप
जब
बच्चा बाल्यावस्था में प्रवेश कर जाता है यानि तीन साल के आस पास का हो जाता है तो
उसकी जरूरतें माँ बाप के अलावा खिलौनों, टॉफी, चाकलेट और आजकल मोबाइल फ़ोन या टी वी
में आने वाले कार्टून की तरफ हो जाती हैं | इस समय
इसका सुख इन चीज़ों से जुड़ जाता है | धीरे धीरे आस पास और स्कूल के दोस्तों के साथ
रहना इन्हें अच्छा लगने लगता है | फिर पसंद के अनुसार पढ़ाई, खेलकूद, घूमना, नाचना,
गाना आदि के रूप में इनका स्वरुप बदल जाता है |
किशोरावस्था में सुख का स्वरुप
बाल्यावस्था
के अंतिम चरण, अर्थात 12 वर्ष तक, में जो पसंद बच्चे की होती है लगभग उसी का वृहत्तम रूप किशोरावस्था में विकसित होता है
| वृहत्तम रूप को साधारण शब्दों में समझें तो अब वह अपनी पसंद या बातों को स्वयं सबसे
ज्यादा सटीक और सही मानने लगता है | उसका सुख इस बात से जुड़ जाता है कि वह जैसा
सोचता है वही सही है बाकी गलत | इसीलिए इस दौरान उसका वैचारिक टकराव सर्वाधिक होता
है | भावुकता उसकी चरम पर होती है और इसलिए वह बहुत जल्दी गुस्सा या नाराज़ और बहुत
जल्दी खुश भी हो जाता है | अपने को सही सिद्ध करने के चक्कर में वह कुछ भी करने को
तैयार रहता है | इसी वजह से किशोर कभी-कभी बहुत बड़ी-बड़ी गलतियाँ कर बैठता है | इस
समय दुनिया में एक हस्ती बनने का सपना वह देखने लगता है और उस रूप को प्राप्त करने
वाले कृत्यों में ही उसके सुख का स्वरुप बदल जाता है | विपरीत लिंग के साथ आकर्षण
एक सामान्य सी बात होती है | उसका सुख उस आकर्षण के रूप में भी आकार ग्रहण कर लेता
है |
युवावस्था या प्रौढ़ावस्था में सुख का स्वरुप
जब किशोर युवावस्था
को प्राप्त होता है तो ज्यादातर युवा दुनिया के भौतिक चीज़ों के प्रति आकर्षित होते
हैं | कुछ आध्यात्म की ओर भी होते हैं | परन्तु यहाँ अध्यात्म या भौतिकवाद पर
विचार विमर्श करना हमारा उद्देश्य नहीं है | अब उनके सुख का रूप अच्छी नौकरी या
व्यवसाय, ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने, अच्छा घर, अच्छी गाड़ी, अच्छी गर्लफ्रेंड या
पत्नी, घूमने टहलने आदि रूपों में बदल ज्यादा है |
यहाँ अध्यात्म के बजाय भौतिकता की बात इसलिए की
जा रही है क्योंकि इसे लोग आसानी से समझ सकते हैं | यों तो अध्यात्म का सुख
सर्वोपरि है और उसका अपना अलग रूप और पैमाना है |
वृद्धावस्था में सुख का स्वरुप
वैसे तो सभी
अवस्थाओं में स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता होती है | परन्तु वृद्धावस्था में एक
व्यक्ति के लिए यह अति आवश्यक हो जाता है क्योंकि बीमारियों से निजात पाने में
अधिक कठिनाई होती हैं | प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है | इस तरह वृद्ध का सुख स्वस्थ
रहने के साथ साथ उसके सामने उसकी सारी जिम्मेदारियों के पूर्ण होने का रूप धारण का
लेती हैं | जैसे सारे बच्चे अपने कैरिअर में सफल हो जायें | उनकी शादी ब्याह हो
जाये | वृद्ध खुद धार्मिक तीर्थ का भ्रमण कर ले आदि-आदि |
सुख का पैमाना
सुख की पैमाइश कैसे
करें ? आज एक साधारण सा गणतीय पैमाना बताता हूँ जिससे आप अपने सुख या दुःख की गणना
कर सकते हैं | एक उदहारण द्वारा समझते हैं –
एक साधारण प्रौढ़
व्यक्ति के सुख की चाह जिन चीज़ों में निहित होती है हम उनको चिन्हित कर 100 के
भीतर ही कुछ अंक दे देते हैं | पूरी तरह से इस प्रकार समझने की कोशिश करते हैं
प्रौढ़ व्यक्ति की
चाहत या इच्छा मान लीजिये इस प्रकार है
चाहत अंक
1.
एक
अच्छी नौकरी 20
2.
मनपसंद
शहर में एक घर 15
3.
मनपसंद एक
कार 15
4.
मनपसंद
लड़की से विवाह 20
5.
दो
बच्चे (एक पुत्र एवं एक पुत्री) 30
कुल 100
सुख का स्तर
यदि उपरोक्त में
व्यक्ति की सारी इच्छाएं या चाहत उसके अनुसार हैं तो उसे 100 में 100 अंक दिए
जायेंगे और वो पूर्णरूपेण सुखी व्यक्ति होगा |
अब मान लीजिये कि
व्यक्ति को सारी चीज़ें पसंद की मिली लेकिन बच्चे एक पुत्र और एक पुत्री न होकर दोनों
पुत्र या पुत्री हैं तो उसके सुख में 30 की जगह 15 अंक हो जायेंगे बाकी के 15 अंक
उसके दुःख में बदल जायेंगे |
और दुःख का प्रतिशत
-15
और यदि उसका घर तो
बना लेकिन उसके मनपसंद शहर में न बन सका तो वह 7.5% और दुखी हो जायेगा |
अब सुख का प्रतिशत
-77.5%
और दुःख का प्रतिशत –
22.5%
यहाँ पुत्र और
पुत्री को 15-15 अंक, शहर को 7.5 और घर को 7.5 अंक आबंटित किये गए हैं |
इसी तरह आप अपने सुख
के सभी चरों की पहचान कर उन्हें अनुपातिक अंक आबंटित कर सकते हैं | फिर चरों के
स्तरों को चिन्हित करके कुल अंकों का पुनः आबंटन स्तर के हिसाब से कर सकते हैं
जैसे ऊपर पुत्र एवं पुत्री तथा घर और शहर के लिए किया गया है |
सुख के स्तर को बढ़ाने एवं घटाने के साधन और सीमाएं -
कुछ ऐसे तत्व होते
हैं जो व्यक्ति के सुख - दुःख को बढ़ा एवं घटा सकते हैं | इनमें से कुछ का विमर्श संक्षेप में यहाँ किया गया है :
स्वास्थ्य – स्वास्थ्य पहला ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है जो आपके सुख या दुःख को अचानक बहुत ऊपर या नीचे ले जाने की क्षमता रखता है |
पसंद – यदि आप की पसंद एक अवयव है तो उसे आपको अंक देने होते हैं | अर्थात आपका सुख दुःख आपकी पसंद के ऊपर निर्भर करता है |
क्षमता – यदि आप अपनी क्षमता से कम या अधिक अपेक्षा रखते हैं तो यह भी आपके सुख सुख का स्तर बढ़ा या घटा सकती है | जैसे अगर आप एक सीमान्त भारतीय किसान है और लंदन शहर में घर बनाने का सपने देखते हैं तो यह आपकी क्षमता से बहुत अधिक है और आपके दुःख में वृद्धि करेगा |
सावधानी एवं लापरवाही – कई बार आपको इस बात का मलाल होता है कि अमुक चीज़ पर मैंने ध्यान नहीं दिया इस कारण वह खराब या नुकसान हो गया | इसका मतलब है कि सावधानी और लापरवाही की भूमिका आपके सुख दुःख के स्तर को निर्धारित करने में होती है |
परिस्थिति – परिस्थियाँ या वातावरण, जिन पर आपका वश नहीं होता है, भी आपके सुख दुःख और उसकी प्रकृति एवं स्वरुप का निर्धारण करती हैं |
यह
सब ऐसे तत्व या अवयव हैं जिनका आप अनुभव स्वयं कर चुके होंगे | परन्तु यह मात्र
इतने ही नहीं है | इनकी संख्या अनंत हो सकती है | जो हर व्यक्ति को अलग अलग तरह से
प्रभावित करती हैं |
वैसे
एक सामान्य से अनुभव की बात है कि आप कैसे अपने सुख और दुःख को बढ़ा और घटा सकते
हैं | रोटी, कपडा और मकान की बात करते हैं | यदि आप पेट भरने के लिए खाना खोजते हैं
तो यह कम मेहनत और आसानी से आप प्राप्त कर सकते हैं | परन्तु यदि स्वाद को महत्व
देते हैं तो दुनिया में न जाने कितने अच्छे और स्वादिष्ट व्यंजन हैं जिनकी तलाश
में आप पूरी जिंदगी देशाटन कर सकते हैं | अगर आप तन ढकने के लिए कपडा खोजते हैं तो
यह भी कम पैसों में और आसानी से उपलब्ध है | लेकिन फैशन के लिए कोई सीमा नहीं है |
ठीक यही कहानी घर की भी है | वास्तव में आप एक छत चाहते हैं अपनी सुरक्षा के लिए
तो यह आसानी से प्राप्त किया जा सकता है लेकिन सुविधा को ध्यान में रखकर यदि इसे बनाना
चाहते हैं तो ज़िन्दगी कम पड़ जाएगी | अब फैसला आपके हाथ में है कि पेट भरने के लिए
खाना है या स्वाद के लिए ? तन ढकने के लिए कपडा पहनना है या फैशन के लिए ? सुरक्षा
के लिए घर में रहना है या सुविधा के लिए ? जो आपको पसंद है और जो आपकी क्षमता है उस
हिसाब से अपने सुख दुःख को बढ़ा-घटा लीजिये |

Analyzed every aspect wonderfully. 100 is perfection....
ReplyDeleteThank you very much...
Deleteits great post.
ReplyDeletethnx for your valuable compliment...
ReplyDeleteWell defined definition of happiness theoretically as well as mathematically. This article is very much useful to know the actual meaning of happiness.
ReplyDeleteThnx brother your analytical comment..
ReplyDeleteThank you very much..
ReplyDeleteGreat thought in words....May i know the person or situation that inspired you for such works....
ReplyDeleteThank you very much big brother....its was always in me for a long in sleeping mode but in this masoon it awakes ..
ReplyDeleteNice analysis and very good writing style
ReplyDeleteधन्य हुए हम प्रभु जो आप यहाँ पधारे।
DeleteGreat analysis on one of the most perplexing sort of questions for many in this changing era. Hats off for some really serious effort taken in giving detailed coverage to every single possible aspect in aforementioned analysis. Keep it up, dear...
ReplyDeleteThank you very much for such a mature comment and for boost me up...thnx once again
DeleteVery nice thought bhai
ReplyDeleteDhanyawad mere partner..
DeleteAmazing and well defined definition of happiness.. We put together hands especially for the mathematical analysis of happiness
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