कितने आज़ाद कितने गुलाम



आज़ादी की 73वीं वर्षगांठ 15 अगस्त 2019 और इसके साथ कुछ विचारणीय प्रश्न | राजनैतिक आज़ादी के 73 वर्षों के बाद भी हम कितने आज़ाद और कितने गुलाम हैं ? क्या हम मानसिक रूप से आज़ाद हो पाए हैं ? या पुरातन सामाजिक बुराइयों की बेड़ियों से आज तक जकड़े हुए हैं ? लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद हर वो शख्स जो राजनीति में हिस्सा लेना चाहता है क्यों नहीं ले पाता ? सबके लिए कानून एक समान होने के बावजूद लोगों को पुलिस और न्यायालय से डर क्यों लगता है ? जो हमारी सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं उन्हीं संस्थाओं के पास जाने से आम आदमी क्यों बचना चाहता है? क्यों ज्यादातर व्यक्ति राजनैतिक शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं ? क्या आम इन्सान के लिए कोई अधिकार नहीं बनाये गए ?

वास्तव में जो कानून है उसमें कोई बुराई नहीं है | इस संसार का जो भी व्यक्ति भारतीय संविधान और कानून को पढ़ता है उसका बखान करने से नहीं रह पाता है | हकीकत भी यही है कि संविधान या कानून में कोई खास कमी नहीं है | फिर यह प्रश्न लाजिमी है कि यह बार-बार फेल क्यों हो जाता है ? इसका कारण यह है कि हमारे संविधान लेखकों और कानूनविदों ने जिस निष्पक्षता से इसे लिखा और बनाया तथा पाठक जिस निष्पक्षता से इसे पढ़ता है उस निष्पक्षता से इसके पालनकर्ता इसका पालन नहीं करते हैं | पालनकर्ता लिंग, जाति, धर्म, भाषाक्षेत्र आदि बुराइयों से ग्रस्त होने की वजह से पक्षपाती हो जाते हैं |

यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि किसी अंतराष्ट्रीय मंच पर जिस लिंग, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र को हम अपनी अनोखी विशेषता बताकर सह-अस्तित्व और विकास का बखान करते नहीं थकते हैं | जिन्हें हम एक गुलिस्तां के रंग-बिरंगे फूल कहते हैं | राष्ट्रीय मंचों पर उन्हीं लिंग, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के आधार पर नीतियों और कानूनों के अनुपालन में भेदभाव करने से भी नहीं चूकते | इन सुन्दर फूलों को तोड़कर फेंकने, गुलिस्तां में अपने वर्चस्व को स्थापित करने और दूसरों के अस्तित्व को मिटाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते | भाई यह दोगलापन क्यों है ? ये दोगलापन आता कहाँ से है ?  क्यों हम कुछ मंचों पर इससे आज़ाद हो जाते हैं और कुछ पर इसके गुलाम ? हम इसको ख़तम करने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं ? यह कैसे विकसित होता है ? इस दोगलेपन की मानसिकता का कारण क्या है ? ये वक्त इसी पर विचार करने का है | तभी यह समझ आएगा कि हम कितने आज़ाद हैं और कितने गुलाम |

वास्तव में इस आज़ादी और गुलामी का मूल कारण व्यक्ति के विभिन्न प्रकार के परिवेश, उसमें किये जाने वाले व्यवहार और उस व्यवहार से निर्मित व्यक्तित्व एवं मानसिकता की उपज है | इसलिए परिवेश को  समझकर ही इस आज़ादी और गुलामी के अनुपात की व्याख्या की जा सकती है |



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 Independence day




बच्चा जब जन्म लेता है तब से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी रूप में परिवार से जुड़ा होता है | यहाँ उन महात्माओं को अपवाद मान लिया जाये जो आध्यात्मिक ध्येय की प्राप्ति हेतु पारिवारिक संपर्क से दूर चले जाते हैं | परन्तु यहाँ उनकी बात नहीं की जा रही जो धर्मगुरु और बड़े बड़े धार्मिक पुरोधा बन कर समाज में सक्रिय हैं | भौतिकता और राजनीति में तल्लीन हैं | लोगों के बीच धार्मिक उन्माद फैलाते हैं और तमाम प्रकार से उसका लाभ उठाते हैं | यहाँ सामाजिक रूप से पूर्ण विलग हो चुके लोगों की बात की जा रही है इसीलिए उन्हें महात्मा कहा गया है |

 एक पारिवारिक परिवेश में बच्चा पलता है | व्यस्क और वृद्ध होने पर अपने आने वाली पीढ़ियों को पालता है| ये दोगलेपन (दोहरे बर्ताव) की जो पहली खुराक होती है यहीं से मिलना शुरू होती है | यह अलग बात है कि इसका इल्म लोगों को नहीं होता या होता भी है तो अपने वर्चस्व को स्थापित करने या बचाए रखने के चलते वे इसे हटाना या मिटाना या बदलना नही चाहते हैं |

जो बातें हम अपने घर परिवार में सदस्यों के बीच करते हैं उनका प्रभाव चारों तरफ मौजूद रहने वाले मासूम मस्तिष्क पर पड़ता है | बच्चों के भीतर ये बातें घुसपैठ करती रहती हैं कि हम अपने घर की महिलाओं, बच्चों और बड़े बुजुर्गों से कैसा व्यवहार करते हैं | यह क्यों हुआ कि महिलाओं को पहले, और आज भी एक हद तक, घर की चारदीवारी में रखा गया ? उनको शिक्षाआर्थिक मामलों और राजनीति से दूर रखा गया ? उनके साथ खान-पान सम्बन्धी भेदभाव किया गया ? यकीन मानिये ये सारी चीजें बच्चों ने घर में सीखी हैं | उन्होंने यह अपने ही घर में देखा और सीखा कि उनके पिताजी, दादाजी, उनकी माताजी और दादीजी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं | घर की लड़कियों ने भी ये देखा कि उनके उनके पिताजी, दादाजी के व्यवहार पर माताजी और दादीजी जी की क्या प्रतिक्रिया है | फिर अपने-अपने हिस्से का यह ज्ञान इन बच्चों ने अपने में भी उतार लिया और भविष्य में ये लोग भी वैसा ही व्यवहार और प्रतिक्रियाएं करने एवं देने लगे | यही नियम घर के सारे रिश्तों और व्यवहारों पर लागू होता है | चाहे वह भाई- बहन, माँ-बाप, भाई-भाई या कोई भी रिश्ता हो | अगर हम यहाँ गुलामी रखना चाहते हैं तो वह गुलामी आगे बढ़ती जाती है और आज़ादी रखना चाहते हैं तो यह आज़ादी आगे बढ़ जाती है| दुर्भाग्य यह है कि संस्कार और संस्कृति की दुहाई देकर घर में ज्यादातर गुलामी को ही आगे बढ़ाया गया है |

किसी बैठक, सभा में या मंच पर महिला सशक्तिकरण का एक आदर्श व्याख्यान तो हम दे सकते हैं लेकिन जब बारी आती है उसी आदर्श को अपने घर की महिलाओं पर लागू करने की तो कदम झट से पीछे खींच लेते हैं | महिलाओं के अन्दर भी आज़ादी की छटपटाहट सदैव मौजूद रही | इसीलिए जैसे ही मौका मिलता है ये अपना अस्तित्व और वर्चस्व की पहचान तो करवा देती हैं पर जब घर के वसूलों के प्रति विद्रोह कि बात आती है तो वो भी अपनी सांस रोक लेती हैं|

इसी तरह मंच पर जब भाई–भाई की बात आती है तो राम-लक्ष्मण का उदाहरण तो दे दिया जाता है लेकिन जब गाँव में रहने वाले अपने किसी बेरोजगार और गरीब भाई की बात आती है तो हम कन्नी काट लेते हैं | यहाँ से पैदा होता है यह दोगलापन और इस तरह परिवार में इसका भरण पोषण होता है |

यदि ऊपरी बुराइयों को हम अपनी संस्कृति और संस्कार के नाम पर थोपते हैं जिन्हें हमारे खुद के बच्चे और समाज या तो नहीं स्वीकार करता या अनमने मन से स्वीकार करता है तो काहे की सांस्कृतिक श्रेष्ठता | श्रेष्ठ तो वह है जो लोगों को मानसिक और शारीरिक आज़ादी दे, सुकून दे और वो भी दूसरों को बिना कष्ट दिए | चाहे वो हमारी संस्कृति हो या किसी और की | याद रखिये जो श्रेष्ठ है उसका विकास खुद-ब-खुद हो जायेगा | चाहे वो बोली भाषा हो, खान-पान हो, वेशभूषा हो, या और भी कोई चीज़ | इसलिए जो बुरी चीज़ें हैं उनकी गुलामी रूढ़िवादी हो कर किसी भी रूप में न करें और न करने दें तभी सही मायने में आज़ाद हो पाएंगे | ये पंक्तियाँ आने वाले सभी सन्दर्भों पर लागू होंगी | इसी दृष्टिकोण से सोचें तो जो परिवर्तन अभी तक हुए हैं और जो हो रहे हैं उनके बारे में बेहतर तरीके से समझ सकते हैं |



ध्यानाकर्षित करने वाली बात है कि हम अपने संपर्क में आने वाले समाज के अन्य लोगों से कैसे पेश आते हैं | यह पेश आना भी हमारे बच्चों और समाज को वैसे ही बनाता है | दुर्भाग्यवश भारत जैसा देश जो सामाजिक रूप से विभिन्न जातियों, धर्मों और आर्थिक तबको में विभक्त है | इस स्तर पर गुलामी का वर्चस्व सबसे ज्यादा प्रबल रूप में विद्यमान है | हो सकता है कि मेट्रो शहरी स्तर पर लोग इससे कम इत्तेफ़ाक रखते हों या न रखते हों, परन्तु छोटे, मझोले शहरों और ग्रामीण भारतवर्ष की यह सबसे कटु और सबसे बड़ी सच्चाई है | बच्चा जब देखता है कि उसका बाप घर के किसी बूढ़े नौकर, जो उम्र में उसके बाप से भी बड़ा है, का नाम लेकर संबोधित करता है तो बच्चा यह सीख जाता है कि वह बूढ़ा नौकर हमारा गुलाम है और वह भी उसे नाम लेकर ही पुकारता है | बच्चा कभी भी नौकर का अभिवादन नहीं करेगा | नौकर ही बच्चे का हमेशा अभिवादन करेगा भले ही वह बच्चा उससे छोटा है | यह संस्कार है जो समाज में घर से ही निकल कर जाता है कि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति का अपमान किया जा सकता है और उसका कोई दुष्प्रभाव सशक्त पर नहीं होता है | इसके विपरीत आर्थिक रूप से सशक्त की गुलामी करने से ही जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है | इसलिए उस सशक्त व्यक्ति की डांट, मार और गाली भी आशीर्वाद के समान है |

ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और भी निचले स्तर पर है | जातिक्रम में आने वाली तथाकथित बड़ी जातियों के छोटे बच्चे भी छोटी जातियों के बड़े बुजुर्गो को उनके नाम से ही संबोधित करते हैं | यह भी उनके घर परिवार और समाज के बड़े-बुजुर्ग ही उन्हें सिखाते हैं | वही यह सिखाते हैं कि अमुक व्यक्ति भले तुमसे बड़ा और पढ़ा लिखा है परन्तु वह अमुक निम्न जाति का है इसलिए उसका ज्ञान तुम्हारे ज्ञान से कमतर है | यही वो लोगों होते हैं जो व्यक्ति को उसके पदक्रम और कर्म के बजाय सामाजिक स्थिति से उसको पहचानने और पहचान करवाने की कोशिश में लगे रहते हैं जिससे समाज में उसका महत्व बढ़ा या घटा सकें | इसके लिए तमाम प्रकार के षड्यंत्र भी रचे जाते हैं | हो सकता है कि यह सौ फीसदी न हो परन्तु मात्रा में अधिक तो अवश्य है | जो अनुभवी हैं इस बात से इत्तेफ़ाक जरुर रखते हैं |

अब आप यह स्वयं विश्लेषण कीजिये कि स्कूलों, कालेजों और विश्वविद्यालयों की कौन सी ऐसी पुस्तक है, कौन सा ऐसा रामायण और महाभारत है, कौन सा ऐसा बाइबिल, कुरान और गुरुग्रंथ है जो यह सिखाता है कि महिलाओं और बड़े-बुजुर्गो की इज्ज़त न करो ? कौन सा ऐसा अध्यापक है जो कक्षा में यह पढ़ाता है कि गरीबों, मजदूरों, कमजोर वर्गों और महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करो ? अगर कोई इसे सिखाता नहीं तो आखिर यह समाज में आता कहाँ से है ? आखिर यह कौन सिखाता है कि अमुक व्यक्ति निचली या उच्च जाति का है, वह गरीब नौकर है, श्रमिक है या अमीर मालिक ? वसुधैव कुटुम्बकम को मानने वाला भारतीय हर व्यक्ति से उम्र के आधार पर अदब के साथ एक रिश्ते में जब बंध जाता है या बांध लेता है तो जाति, आर्थिक स्थिति और लिंग आदि के आधार पर अनुचित और भेदभावपूर्ण जो व्यवहार समाज में हो रहा है उसे कौन सिखाता है ?

अब उत्तर देने की आवश्यकता नहीं | यह जातीय और प्रजातीय भेदभाव और इसकी गुलामी अपने घर और समाज में घरवाले और समाजवाले ही सिखाते हैं | जबकि बाहरी मंच पर ये समानता और सम्मान का घंटों भर का लम्बा भाषण देने का माद्दा रखते हैं | यहाँ से होती है इस दोगलेपन की शुरुआत | जिसकी प्रथा आज भी छद्म स्वाभिमान के चलते बदस्तूर जारी है |



देश में राजनीति ऐसा केन्द्रीय रूप धारण कर चुकी है जिससे कोई भी अन्य पहलू जैसे सामाजिक. आर्थिक, धार्मिक, प्रशासनिक और यहाँ तक कि पर्यावरण भी अछूता नहीं रह गया है | इसलिए ये सारे अवयव राजनीति से  प्रभावित होते हैं | हाँ यह भी सच है कि ये अवयव भी एक सीमा तक राजनीति को प्रभावित करते हैं | जो देश में आज़ादी और गुलामी की दिशा और मात्रा तय करते हैं | आइये देखते हैं कैसे: 

राजनीति और सामाजिक परिवेश


देश के नागरिकों को यह महसूस हो चूका है कि अपना हक़ लेने के लिए लड़ाई लड़नी पड़ेगी | लेकिन यह लड़ाई प्राचीन और मध्यकाल की लडाइयों जैसी नहीं है जहाँ शारीरिक नुकसान पहुँचाने वाले अस्त्रों-शस्त्रों से लडाइयां लड़ी जाती थीं | लोकतंत्र होने की वजह से राजनैतिक समझ लोगों में बढ़ी है | अब उनको यह पता है कि शक्ति और अधिकार कानून में निहित होते हैं| वो शक्तिशाली तभी बन पाएंगे जब उनके खुद के मुताबिक कानून बनेगा | खुद के मुताबिक कानून तभी बन सकता है जब वो खुद कानून निर्माता की हैसियत पायेंगे | इस हैसियत को प्राप्त करने के लिए विधि-निर्माता (विधायक) बन कर विधायिका में जाना पड़ेगा | विधायिका में पहुचने के लिए लोगों का वोट चाहिए | वोट पाने के लिए आज समाज को जातीय आधार पर इतना तोड़ दिया गया है कि हम देश के वासी होने से पहले जातिवादी हो गए हैं | तमाम प्रकार के नेता तमाम प्रकार से विभिन्न जातियों की प्राचीन गौरव गाथा का गुणगान कर या उनकी नाजुक और कमजोर स्थिति बताकर उनका हितैषी बनना चाहते हैं | इस जातिवाद के अतिशय ने आज भारतवासियों की भारतीय के रूप में पहचान को पिछले पायदान पर और जातिगत पहचान को पहले पायदान पर ला दिया है | इसमें राजनीति की भूमिका इतनी बड़ी है कि राजनीति ने देशवाशियों को जातीय गुलाम बना दिया है | 
     

राजनीति और धार्मिक परिवेश


       जातीय समीकरण की भांति धार्मिक समीकरण को भी राजनीति चरम तक पंहुचा चुकी है | जातिवाद की खुराक के बाद भी जब इन स्वार्थी नेताओं का वोट पूरा नहीं हुआ तो देशवासियों को इन्होंने धर्म की अफीम खिला कर इन्हें अपने वश में करने की चाल चली | परिणाम ये रहा की भोला-भाला आम देशवासी इनके चक्करों में पड़कर अपने ही पड़ोसियों का खूनी बन बैठा | मानव और मानवीय गुणों की जगह धर्म को इतनी तरजीह दी जाने लगी है कि मानवश्रेष्ठ की जगह धर्मश्रेष्ठ बनना लोग पसंद करने लगे हैं और इस छद्म श्रेष्ठता के लिए धर्म के गुलाम बन गये | राजनीति ने ऐसा धार्मिक उन्माद फैला रखा है कि धार्मिक आतंकवाद की नयी विचारधारा बह निकली | धर्म के नाम पर आज कोई भी चीज़ परोसी जा सकती हैं और धर्म के नाम पर किसी की भी जान को आसानी से कुर्बान किया जा सकता है | कहने का अर्थ यह है कि राजनीति ने धर्म के नाम पर लोगों को ऐसा गुलाम बना दिया है कि मनुष्य में धर्म की बात आने पर मानवीय तत्व का लोप हो जाता है | इस विलोपन की दशा में दंगा और आतंक फैला कर नेता राजनैतिक हितों की पूर्ति कर लेते हैं | 
     

राजनीति और आर्थिक परिवेश


आधुनिक राजनीति करने के लिए आचरण से ज्यादा जरुरी पैसा है | क्योंकि देश के गरीब, कंगाल नागरिकों के वोटों को उनके भविष्य को उज्जवल करने वाली नीतियों और वादों की अपेक्षा कुछ पैसों, पैगों और मांस के चार टुकड़ों द्वारा आसानी से ख़रीदा जा सकता है | पैसा कमाने के लिए राजनैतिक ताने बाने तक पहुँच की जरुरत होती है | इस समीकरण के हिसाब से एक उद्योग है राजनीति | पैसा कमाना है तो राजनीति में निवेश कीजिये | प्रभावशाली राजनीति करनी है तो पैसा लाइये | इसीलिए आज ज्यादातर नेताओं के पास अपना उद्योग है और उद्योगपति नेता हैं | प्रतिक्रमात | इसका सीधा सा उदहारण है कि वर्तमान लोकसभा में 83% सांसद करोडपति हैं |

धन और राजनीति के इस गठजोड़ ने नेताओं को उद्योगपतियों का और उद्योगपतियों को राजनेताओं का गुलाम बना दिया है | नेताओं को चुनाव में खर्च करने के लिए पैसे चाहिए जो एक उद्योगपति ही उन्हें दे सकता है  और बिजनेसमैन को बिजनेस करने के लिए जमीन, खनिज, प्राकृतिक संसाधन, श्रम और लोन चाहिए | वो भी सस्ते दर पर | ताकि अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जा सके | ये सब एक नेता ही अपनी राजनैतिक पहुँच की वजह से उन्हें दिलवा सकता है |

नेताओं और बिजनेसमैन के आपसी सांठ-गांठ के चलते बाकी जनता का हित दर-किनार कर दिया गया है| आम इंसान एक-एक पैसे और रोजगार के लिए तरसता रहता है जबकि उद्योगपतियों को मुफ्त का लोन और जमीन दे दी जाती है | किसानों और आदिवासियों की जमीन कारखाने लगाने के लिए दे दी जाती है | आम इंसान एक निवाले के लिए तरसता है और नेता-उद्योगपति इनकी कमाई का खाना निगल जाते हैं | आम इंसान एक-एक  बूँद पानी के लिए मोहताज हैं और वो बोतलबंद पानी को स्वीमिंग पूल में भरकर नहाते हैं |

राजनीति और उद्योग ने मिलकर इस देश से नैतिकता को दूसरे ग्रह पर जाने को विवश कर दिया है | ऐसा नहीं है कि उसे वापस नहीं लाया जा सकता | लेकिन वो राह कठिन है और लोगों को लगता है कि उस ग्रह तक जाकर उस नैतिकता को वापस लाने में जितनी ऊर्जा और मेहनत करेंगे उससे कम में इस गठजोड़ से एक जोड़ बनाया जा सकता है | वहां तक जाने से अच्छा है इसी ग्रह पर जुगाड़ कर लिया जाय | वैसे भी अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता | कौन लड़े कौन मरे ? जैसे सब जी रहे हैं हम भी इन नेताओं और उद्योगपतियों की थोड़ी गुलामी करके ज़िन्दगी काट लेते हैं | इस गठबंधन ने लोगों की नैतिकता को अपना गुलाम बना रखा है | अपने शोषण के चक्र का ऐसा घनचक्कर चला रखा है कि इससे बाहर कोई निकल ही नहीं पा रहा है |

राजनीति और प्रशासनिक परिवेश


मनुष्य में एक जन्मजात प्रवृत्त्ति होती है, शक्ति और धन अर्जन की | यह शक्ति और धन अर्जन सहजीवी होते हैं | यह प्रवृत्त्ति मनुष्य में सुसुप्तावस्था में सदैव विद्यमान रहती है | सही जलवायु पाते ही यह अंकुरित हो जाती है | उचित मात्रा में खाद, पानी, तापमान और हवा मिलती रहे तो यह वृक्ष का रूप भी बहुत जल्दी धारण कर लेती है |

राजनैतिक शक्ति से लैस नेता जब प्रशासनिक शक्ति से लैस अधिकारियों को खाद पानी देना शुरू करते हैं तो वह प्रशासन का तापमान और हवा की गति ऐसे उचित अनुपात में रखता है कि धन का अर्जन शुरू हो जाता है| चूँकि यह खाद, पानी, हवा और तापमान सब प्राकृतिक न होकर रासायनिक यानि बनावटी होता है अतः समाज पर इसका सकारात्मक प्रभाव न होकर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | क्योंकि यह धन का अर्जन न होकर धन का दोहन होता है | इसके दोहन से आज भ्रष्टाचार नाम का वृक्ष बहुत विशाल हो चुका है | 

नेता हमेशा ऐसे अधिकारी चाहते हैं जो उसकी हाँ में हाँ मिलाये उसे कमाकर खिलाये | अधिकारी धन के दोहन में कोई बाधा न आये इसलिए नेता जी का आशीर्वाद चाहता है | यहाँ भ्रष्टाचार की पहली कड़ी तैयार होती है| अधिकारी भी अपने निचले क्रम के अधिकारियों से यही चाहता है और निचले क्रम का अधिकारी अपने ऊपर के अधिकारियों का आशीर्वाद | इस तरह इस कड़ी में कड़ी जुडती जाती है और आज ऐसी लम्बी कड़ी बन गयी है कि बहुत कम ही नेता, मंत्री और अधिकारी इससे अछूते हैं | ये ऐसे अवशोषक हैं जो साधारण जनता का पैसा लगातार चूस रहे हैं | हाँ, कुछ लोग अवसर न पाने की वजह से आज तक ईमानदार बने हुए मिल सकते हैं |

इसका प्रभाव दो प्रकार से देश पर पड़ता है - पहला, प्रशासनिक अक्षमता वाले अधिकारियों का, भ्रष्ट नेता और अधिकारियों से गठजोड़ होने पर, प्रभाव बढ़ जाता है और भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है | दूसरा, ईमानदार और क्षमता वाले अधिकारियों का, दंड और प्रताड़ना के कारण, मनोबल गिरता चला जाता है, क्योंकि वो भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की लल्लो-चप्पो नहीं करते तो उन्हें तमाम प्रकार से दण्डित और प्रताड़ित किया जाता है | ये दोनों ही स्थितियां देश के लिए खतरनाक हैं | यह व्यवस्था इस तरह उलझ चुकी है कि अब यह अनसुलझी पहेली बन चुकी है जिसका कोई हल नज़र नहीं आ रहा है | कई नेता और अधिकारी चाहते हुए भी इससे आज़ाद नहीं हो पा रहे हैं |



सृष्टि ?? क्या है कैसे चलती है ? सबसे जरुरी कौन से अवयव हैं इस सृष्टि के संचालन के लिए ? ये सारे प्रश्न और इन पर विचार बहुत जरुरी हैं वर्तमान समय में | क्योंकि जिन भौतिक चीज़ों को हम तरजीह दे रहे हैं वो हमारी सृष्टि के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक हैं | यदि समय रहते हम नहीं चेते तो यह सारी दुनिया एक पल में मरुस्थल की रेत बनकर उड़ जाएगी |

आज उद्योग लगाने के लिए, खेत और घर बनाने के लिए, पेड़ों और जंगलों की कटाई बेहिसाब जारी है | प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन हो रहा है | शहरीकरण और आधारभूत संरचना के नाम पर कंक्रीट के नए-नए जंगल खड़े किये जा रहे हैं | संचार संसाधनों के नाम पर नई – नई तकनीक से युक्त ऑटोमोबाइल और मोबाइल फोन लांच किये जा रहे हैं | स्वादिष्ट भोजन के नाम पर रासायनिकयुक्त भोजन परोसा जा रहा है | कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए हानिकारक रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ गया है |

इस भौतिकवादी युग में विकास के नाम पर जो प्रदूषणकारी कार्य प्राकृतिक संसाधनों की कुर्बानी देकर किये जा रहे है वो इस सृष्टि के संचालन के मूलभूत अंग जल, जंगल, जमीन और हवा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं |

मनुष्य भौतिकवाद का ऐसा गुलाम बन गया है कि उसकी मति मारी गयी है | उसे यह समझ नहीं आ रहा है कि वह एक दिन बिना खाना खाए तो रह सकता है लेकिन बिना हवा के एक पल नहीं जी सकता | उसे इस बात का इल्म नहीं है कि कंक्रीट के जंगल से धरती में नीचे पानी नहीं जा पा रहा है | लगातार जलस्तर गिरने से जलसंकट गहराता जा रहा है | वो प्रदूषणयुक्त संचार साधन से कम समय में बहुत दूर भले पहुच सकता है लेकिन प्रदूषणयुक्त वातावरण में अपनी ज़िन्दगी की पूरी दूरी तय नहीं कर पायेगा | रसायनयुक्त भोजन से वह स्वाद का अनुभव तो कर सकता है लेकिन इनके दुष्प्रभाव से होने वाली लाइलाज बीमारियों का दर्द नहीं झेल पायेगा |

आज पैसा कमाने और आर्थिक विकास के नाम पर राजनीति और राजनेता इतने गिर गए हैं कि पैसे के लिए शराब, गुटखा, नशीले ड्रग्स जैसे बुराइयों को बढ़ावा दे रहे हैं | प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की मात्रा को दर किनार कर उद्योग लगाये जा रहे हैं | जंगलों को काटा जा रहा है | जैव संतुलन की कोई सुध नहीं है | इन सबके नाम पर एक-एक समितियां, आयोग या अन्य संस्थाओं को बना कर सरकार अपनी इतिश्री मान ली है | इन संस्थाओं में भी राजनैतिक दबाव और भ्रष्टाचार के चलते किसी भी नियम का सही से अनुपालन नहीं हो रहा है | यहाँ भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है | इसका परिणाम हमे प्रकृति बेसमय की बाढ़, सूखा, चक्रवात, ओजोन क्षरणभूस्खलन आदि के रूप में दिखाती है | लेकिन हम इतने बेशर्म हो गए हैं कि राजनीति, पैसे और बनावटी सुख के चक्कर में प्राकृतिक संकेतों को देख कर भी अनदेखा कर दे रहे हैं |


राजनीति का अपराधीकरण


साम दाम और भेद से जब कोई काम नहीं होता है तो दंड का प्रयोग किया जाता है | भारतीय राजनीति यह बात अच्छी तरह से समझती है | इसीलिए चुनाव में जीत के लिए आतुर नेता जब समझाने, बुझाने और पैसा देने से वोट नहीं खरीद पाता या अपने विरोधी को मार्ग से नहीं हटा पाता तो वह उनकी जान लेने से भी नहीं चूकता | कहने का अर्थ जब पैसा, पैग और मांस का चार टुकड़ा काम नहीं करता तो वो एक नए प्रकार के हथियार का प्रयोग करते हैं जो सीधे ज़िन्दगी या मौत का विकल्प रखती है | इसके बीच का कोई रास्ता नहीं होता | अभी तक पैसा एक ऐसा माध्यम था जो उद्योगपतिओं को राजनीति से जोड़ता था लेकिन जब ये पैसा काम करना बंद कर देता है तो सशस्त्र आतंक का क्रम आता है| जिसका प्रयोग करके वोट हासिल किया जा सकता है और चुनाव जीता जा सकता है | यही क्रम अपराध करवाता है और अपराधियों का राजनीति में मार्ग सुनिश्चित कर देता है | यही कारण है कि वर्तमान लोकसभा में 33% सांसदों के ऊपर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं |

इस प्रकार यह देश राजनैतिक रूप से अंग्रेजों से भले आज़ाद हो गया है लेकिन भारतीय चेहरे में छुपी हुई  अंग्रेजियत से यह आज़ाद नहीं हो पाया है | आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक किसी न किसी कारणवश अपनी नैतिकता खो चुके हैं | प्राचीन रूढ़िवादिता, जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा और आर्थिक स्थिति के गुलाम आज भी बने हुए हैं | राजनीति अपराधियों की शरण स्थली बन चुकी है | नैतिक रूप से उच्च और पढ़ा लिखा आदमी राजनीति के गिरते मूल्यों की वजह से दूर रहना पसंद करता है | हम कहीं से भी पूर्ण रूप से आजाद नहीं हैं |

इतिहास बताता है कि गुलामी और बुराइयों से लड़ने के लिए लोग विभिन्न प्रकार के संगठनों का निर्माण करते थे | समाचार पत्रपत्रिकाओं का प्रकाशन करते थे | इन संचार साधनों का इस्तेमाल कितनी सफलतापूर्वक हुआ यह भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से समझा जा सकता है | उनका अपना एक विज़न और मिशन था | परन्तु आज ऐसा नहीं है | आज जितने भी संगठन है, जितने भी पत्र पत्रिकाएँ हैं, वो सब मुनाफे के लिए काम कर रहे हैं | न उनका कोई विज़न है न कोई मिशन | उनकी अपनी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि देश में गलत मूल्यों और आदर्शों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए | बल्कि इसके उलट अगर आप इन्हें इनकी मुंहमांगी कीमत देने के लिए तैयार हैं तो आप कोई भी सही-गलत, नैतिक-अनैतिक काम इनसे करवा सकते हैं | इन्हें बस पैसे से मतलब है | यही कारण है कि आज का मीडिया बिकाऊ है यह जो दिखाता है सबमें इसका आर्थिक हित छुपा हुआ रहता है | जो संस्थान, संगठन या लोग निष्पक्ष रूप से सरकार की गलत नीतियों और अनैतिक कृत्यों की आलोचना करते हैं उन्हें सरकार, सरकारी मशीनरी और सरकार से जुड़े लोग विभिन्न प्रकार से तंग करते हैं | कभी गाली-गलौज, धमकी, मार-पीट, किसी षड्यंत्र में फंसाना आम बात है | इतने पर भी चुप न हुए तो उनकी हत्या भी करवा दी जाती है | कहने का मतलब, अभिव्यक्ति की उतनी ही स्वतंत्रता है जहाँ तक नेता, सरकार, उनकी नीतियों का समर्थन किया जाय | अगर आप उनकी गुलामी छोड़कर आज़ादी की तरफ कदम बढ़ाएंगे तो आप को मौत की नींद सुला दिया जायेगा |

जो आज़ादी दिखाई देती है वो छद्म आज़ादी है जिसकी तुलना में प्रछन्न गुलामी ज्यादा है | इसकी बेड़ियों को तोडना तो मुश्किल था ही लेकिन अब नयी नयी बेड़ियाँ भी इसे जकड़ती जा रही हैं | जिनको तोड़कर पूर्णरूपेण आज़ाद नहीं हुआ जा सकता | इसके लिए अभी कितना समय लगेगा इसका कोई पैमाना नहीं |

ऊपर कही गयी हर बात को चुनौती दी जा सकती है | वो चुनौती आप कागजों पर जीत भी सकते हैं जैसे हर चीज़ इस देश में दस्तावेजों, बैठकोंसभाओं और मचों पर जीती जा रही है | लेकिन विश्वास कीजिए व्यवहारिक रूप से और मात्रा के अनुपात में नहीं जीत सकते |

अब सोच के देखिये कि, कितने आजाद और कितने गुलाम हैं, हमसब.............

    

Comments

  1. सर ब्लॉग बहुत बड़ा और विस्तार से लिखा हुआ हैं सोशल मीडिया पर इतना बड़ा ब्लॉग कोई नही पड़ता हैं

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  2. बात तो सही है आपकी। अगली बार से ध्यान रखूँगा आपकी बात का।

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  3. ब्लॉग छोटा और मुद्दे का होना चाहिए

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    2. छोटा नहीं है। लेकिन मुद्दा तो है।

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  4. Bahut badi bat kah diya aapne,bade hi saral sabdon me. But badi baten chhote lekhon ke madhyam se bhi vyakt ki ja sakti Hain, aisi aapse ummid rahegi.

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  5. हाँ मिथुन जी। आप सही कह रहे हैं।

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  6. Bahut hi relevant topic chuna apne .har tarah ki Gulami ( samajik ,arthik , rajnitik ) ko behad hi saral sabdon me vyakt kiya h apne . Hme sochne ki jrurat h .
    Very nice effort ...👍

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    1. Satish dhanyawad.

      .log kah rahe hain ki blog bada hai..jab issue hi itna bada hai to blog to bada ho hi jayega na..

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    2. Logo ka apna opinion h bhaiya but issue really bhut hi relevant h so muje lgta blog ki lambai koi issue nhi balki actual issue par bat honi chaiye.

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  7. Replies
    1. Naresh bhai bahut bahut dhanyawad..aapke valuable comment ke liye...

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