जीवन सिद्धि

stress free life, tension free life
stress free life

                                                                                                             

संसार में हर युग में प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-2 समस्याएं रही हैं, आज भी हैं और आगे भी रहेंगी | व्यक्ति  किसी न किसी वजह से परेशान या दुखी रहता है | व्यक्ति को यह जरुर विचार करना चाहिए कि वह क्या चाहता है | इसी चाहत के मुताबिक उसके विचार उत्पन्न होते हैं और इन्हीं के अनुसार वह ऐसी  का निर्माण अपने मस्तिष्क में करता है | यदि व्यक्ति अपनी परेशानी और दुःख को कम करना चाहता है तो उसे अपनी वैचारिक परिस्थितियों का निर्माण इस प्रकार करना चाहिए कि वह दुख में भी सुखी रह सके |



इसके लिए उसे कुछ विचार अपनाने पड़ते हैं जिनकी सकारात्मकता से उनके शरीर में सकारात्मक हॉर्मोन का स्त्रावण हो सके | उदाहरनार्थ,


1.   आज जो भी परिस्थिति है यह स्थाई नहीं है तो इस परिस्थिति के हिसाब से अपने स्थाई विचार ना बनने दें | यह सदैव ध्यान रखें कि यह दौर बीत जाएगा और नया दौर आएगा जिसमें आप अपने हिसाब से अपने जीवन को दिशा दे सकते हैं | आप अपनी अपेक्षित दुनिया बना सकते हैं | यह परिस्थिति आपकी मानसिक स्थिति को चुनौती दे रही है | यह आपको हराना चाहती है | क्या आपको हार पसंद है? निश्चित रूप से नहीं | तो फिर इस परिस्थिति से अपने दिमाग में हार जाने वाले उत्पन्न विचारों को हावी मत होने दीजिए |


2.   जीवन के अनेक चरण होते हैं | प्रत्येक चरण के अपने गुण व दोष होते हैं | इसलिए इस चरण के दोषों की वजह से आने वाले चरण को तबाह नहीं होने देना चाहिए | जैसे यदि आप पढ़ाई में कमजोर हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप को नौकरी नहीं मिलेगी | आपका कैरियर नहीं बनेगा | आप की शादी नहीं होगी | आप का जीवन अर्थहीन है | आप धरती पर अपने घर परिवार, समाज और देश के लिए बोझ हैं और आप सुसाइड कर लें | दरअसल आपका पढाई में कमजोर होना आपका अपना विचार नहीं है ये आपके यार-दोस्तों, माँ-बाप, भाई-बहन, इस देश, समाज और परिवार का विचार है जो आपकी वैचारिक परिस्थिति को प्रभावित कर अपनी गिरफ्त में ले लिया और आपके भीतर नकारात्मक विचारों को भरकर आपको दुष्प्रेरित कर दिया | आपने उनके सामने समर्पण कर खुद को दोषी मान लिया |

आप दूसरों के द्वारा पहचाने गए अपने उन दोषों पर ही फोकस ना करें | अपने गुण पर फोकस करें | हो सकता है कि आपको मोबाइल गेम खेलना ज्यादा पसंद हो, आपको क्रिकेट या  ताश खेलना पसंद हो | संगीत या डांस पसंद हो | आप दुसरे के बताये दोषों के बजाय अपने गुण पर फोकस करें | जिससे आप अपना कैरियर अपने पसंदीदा क्षेत्र में बना सकते हैं | न की दूसरों द्वारा बनाई परिस्थितियों के हिसाब से अपनी धारणा बनाकर आत्महत्या कर लें |

 

3.   आपको तो पहले से ही एक छोटी सी कहानी बताई गयी होगी या कहीं न कहीं आपने सुनी होगी | जो पढ़ने लिखने में ज्यादा होशियार होते हैं वह कोई न कोई प्रतियोगी परीक्षा पास करके डॉक्टर इंजीनियर और बड़े बड़े अधिकारी बन जाते हैं | जो उनसे कमजोर होते हैं और पढ़ते-पढ़ते कहीं सफल नहीं होते हैं वह आने वाले समय में किसी ना किसी राजनीतिक दल के सदस्य बनकर नेता बन जाते हैं | और जो अधिकारी या नेता नहीं बन पाते हैं वह ज्ञानी बाबा बन जाते हैं | बाबाजी, जो पहले सबकी नज़रों में गए-गुजरे थे, नेता जी को नियंत्रित करते हैं और नेता जी बड़े-2 अधिकारीयों को नियंत्रित करते हैं | वैसे यह कहानी सब पर लागू नहीं हो सकती है लेकिन ये कुछ अर्थों में सत्य और प्रेरणादायक है | तथ्य यह है कि आज यदि हम असफल हो रहे हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम जीवन में असफल ही होंगे | कहना यह है कि आज दुसरे के लिए हम जिसे परिभाषागत सफल समझ रहे हैं लेकिन स्वयं असफल हैं | आने वाले समय में हम दुसरे से ज्यादा सफल हो सकते हैं | बशर्ते स्वयं के असफल होने वाली परिस्थिति में भी सकारात्मकता बनाये रखें कि आज की हार का मतलब ये है कि आने वाले समय में इससे बड़ी जीत मिलने वाली है बस प्रयास जारी रखा जाय |


4.   सफलता या असफलता के बजाय हमेशा यह देखिए कि आपने ईमानदारी से प्रयास किया है या नहीं | बात सफलता असफलता की नहीं होती | लोगों की सफलता-असफलता से अपनी तुलना मत कीजिए | आप स्वयं से अपनी तुलना कीजिए | कि कल आपने क्या प्रयास किया था ? कितना परिणाम प्राप्त हुआ ? यदि पूर्ण परिणाम प्राप्त ना हुआ तो अर्थ है कि या तो प्रयास पूर्ण रूप से नहीं किया गया या प्रयास की दिशा गलत थी |  पुनः यह पता लगाने के बाद कि प्रयास में कहाँ कमी है दिशा कहाँ गलत है कमियों को दूर कर प्रयासरत रहना चाहिए|  हमेशा अपने प्रयासों में सुधार और भरोसा रखना ही हमें संतोष और सुख प्रदान करता है ना कि दूसरों से तुलना करना |


5.   एक बात औरमनुष्य को स्वयं की क्षमताओं की जानकारी सबसे ज्यादा होती है | हालांकि क्षमताओं को घटाया-बढ़ाया जा सकता है | लेकिन वो भी स्वयं आप पर निर्भर करती है | इसलिए कभी भी किसी के बहकावे में न आकर अपनी क्षमताओं के अनुसार कार्यों का चयन करना चाहिए | किसी की नक़ल नहीं करनी चाहिए | आपकी सफलता आपकी क्षमता पर निर्भर करती है न कि दूसरों से नक़ल, तुलना या दूसरों के दुष्प्रेरण पर | याद रखिये आपकी सफलता में सब भागीदार बनना चाहेंगे लेकिन असफलता में सब आलोचक | इसलिए यदि आपको जब भी कोई कार्य आपकी क्षमता के बाहर प्रतीत हो तो उसको छोड़ देने या मना कर देने में कोई बुराई नहीं है | आप स्वयं के लिए, स्वयं के सुख के लिए, स्वयं की जिंदगी के लिए जीयें न कि किसी अन्य को संतुष्ट करने के लिए | दूसरों को संतुष्ट किया ही नहीं जा सकता क्योंकि दूसरों के मनोभाव और विचारों पर आपका नियंत्रण नहीं है | यदि आप स्वयं के जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो अपने मनोभावानुसार वर्ताव करना पड़ेगा | जो चीज़ें क्षमता में हैं उसके लिए हाँ और जो नहीं हैं उनके लिए न कहना सीख लीजिये | अन्यथा दूसरों की अपेक्षाओं का बोझ आपके जीवन को नरक बना देगा | 

 

6.   जैसा कि ऊपर जीवन के विभिन्न चरणों की बात की गयी है | मनुष्य का जीवन विभिन्न चरणों से गुजरता है | जीवन में बच्चा अपने घर से जब स्कूल जाता है, स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से नौकरी, नौकरी से शादी, शादी के बाद माँ-बाप से दूरी और अपने पत्नी बच्चों से ज्यादा लगाव, दोस्तों से दूरी, बचपन से किशोर, किशोर से युवा, युवा से अधेड़, अधेड़ से वृद्धावस्था आदि-2 विभिन्न चरणों से गुजरता है | मनुष्य के दुखों का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि जब वह एक चरण से दूसरे चरण में चला जाता है तो भी वह पहले वाले चरण में ही रहना चाहता है जबकि वास्तव में वह बाद वाले चरण में आ गया है और दूसरे में अब नहीं जा सकता | जैसे जब छोटा बच्चा अपने घर के पारिवारिक माहौल से विद्यालयी चरण में जाता है तो वह उसे आसानी से स्वीकार नहीं करता है | उसका स्कूल जाने का मन नहीं करता है | वह स्कूल न जाने के बहाने ढूंढने लगता है | इसी प्रकार जब व्यक्ति शिक्षित होकर नौकरी पेशा हो जाता है तो उसमें वह बंदिशें महसूस करता है और कालेज के मनमाने दिनों को याद कर दुखी होता है | घर और कालेज से दूर होने पर घर से सदस्यों और दोस्तों को याद कर दुखी होता है | उसे यह भी इल्म होता है कि वह सोच कर कुछ भी नहीं कर सकता है फिर भी वह सोच -2 कर दुखी होता रहता है |  जबकि उसे करना ये चाहिए कि वह अब जहाँ आ गया है | जिस माहौल-परिवेश में है, वहां उसे दोस्त और सम्बन्ध बनाकर जीवन का आनंद लेना चाहिए |


7.   इस प्रकार आने वाले जीवन के विभिन्न चरणों उसकी चुनौतियों और उससे उबरने का एक अलग विषय होना चाहिए जो अनिवार्य रूप से पढ़ाई के सभी कोर्सों में शामिल करना चाहिए | क्योंकि कुछ हो न हो जीवन के विभिन्न चरण थोड़े बहुत बदलाव के साथ किसी न किसी रूप में संसार के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आते हैं | यदि उसे आने वाले चरण की चुनौतियों की जानकारी और उससे उबरने के कुछ तरीके पहले से पता हों तो वह वैचारिक रूप से उस तरह का सकारात्मक परिवेश अपने मन-मस्तिष्क में बना सकता है | यदि विचार अच्छे और सकारात्मक होंगे तो उसके शरीर में सकारात्मक हार्मोन स्रावित होगा और व्यक्ति जीवन का अधिकतम आनंद उठा सकता है |

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