साइलेंट डिस्टर्बिंग ध्वनि


दिन भर थक हार कर घर पहुंचा। पानी पिया। तबियत थोड़ी  ठंडी हुई। और ठंडक पाने की खातिर ऊपरी पोर्च में प्लास्टिक की कुर्सी डालकर ठंडी हवा लेने के लिए बैठ गया। तन मन में थोड़ी हरियाली आयी तो आंख बंद कर पिछली दीवार के सहारे सर टिकाकर पुरानी सिंदूरी शाम में खोने लगा। प्राकृतिक हरियाली के बीच अपने आशियाने में वापस लौटते पक्षियों के कोलाहल के साथ ताल मिलाकर माशूका के सुर में सुर मिलाने की कोशिश करता हुआ आगे बढ़ रहा था। उनकी सुरीली आवाज का माधुर्य इतना कर्ण प्रिय लग रहा था कि सारा कोलाहल अब उनकी ध्वनि की तीव्रता और तारत्व के साथ लय के चढ़ाव-उतार में तब्दील हो गया था।



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आनंद के इस क्षण की अनुभूति किसी मोक्ष से कम नहीं। मोक्ष प्राप्त करने का यह योग न जाने कितने दिन की तपस्या के बाद कुछ क्षण के लिए आता है। ऐसे क्षण में भी मोक्ष प्राप्त करने के लिए योग के कुछ नियम व शर्तें होती हैं । इसीलिए कभी-2 ऐसा हो जाता है कि क्षण तो आ जाता है परंतु योग के जो नियम और शर्तें होती हैं उनके अनुसार योग न करने से यूं समझिए कि मोक्ष मिलते-2 रह जाता है। शर्तों में पहली शर्त है दृढ़ निश्चयी होना। दृढ़ निश्चयी के बाद साहसी होना। क्योंकि कई बार अकेले में हम दृढ़ निश्चयी तो होते हैं परंतु जब उनके क्रियान्वयन की बारी आती है तो साहस ही नहीं जुटा पाते। अगला नियम है समय का और लोगों की नजरों का पारखी होना। धैर्यवान व्यक्ति ही समय की कुर्बानी दे सकता है। न जाने कितने दिन-महीनों का अनजाने ही इंतज़ार में कत्ल  हो जाता है। तब कहीं जाकर यह महत्वपूर्ण क्षण आता है कि जब लोगों की नज़र आपको नहीं देख रही होती है और आप अपनी दृढ़ निश्चयता का परिचय देते हुए माशूका का हाथ पकड़कर अपनी हथेली में लेकर योगसिद्धि करते हुए उस पल का आनंद ले रहे होते हैं। 


ये सब तो ठीक है। आनंद ही आनंद । ऐसा लग रहा है हम आनंद के समुद्र में गोते लगा रहे हैं। लगातार आनंद से अपने को सराबोर करते जा रहे हैं। पर एक पिद्दी सा रक्तचूषक मच्छर हमारे हाथ पर बैठ हमारा खून चूसते हुए आंनद के समुद्र में व्हेल जैसा हलचल मचा रहा है। परंतु फिर भी दोनों में एक समानता है, शिद्दत की। वो भी चाह रहा है कि डिस्टर्ब न करे कोई और मैं भी चाह रहा हूँ कि डिस्टर्ब न करे कोई। अब आनंद और संकट की इस  दोहरी घड़ी से कैसे निपटें। इसका हल जो निकाल लिया वो ही प्रेम के रसातल में डूबा सच्चा प्रेमी। 


उम्र के इस पड़ाव पर मोक्ष के पुराने योग को एकमात्र  के टाइम मशीन के सहारे वापस युवावस्था में जाकर माशूका के हाथ को थामे हुए फुरसत के सिंदूरी शाम में ही प्राप्त किया जा सकता है। ढलता सूरज, आती शाम का आनंद। बस कुछ पूछिये मत। डिस्टर्ब हो जाता है। उस मच्छर की तरह। उसे उड़ाने के चक्कर में पड़ें तो माशूका का हाथ छूट जाता है और अगर हाथ पकड़े रहे तो खून चूसा जाता है। 


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तनिक उदाहरण देखिए प्रेमानुभूति का। हम उनके प्रेम में हाथ छोड़ नहीं पा रहे। भले ही मच्छर का खंजर मुझे लहूलुहान किये जा रहा है। हम तो वैसे भी धैर्यवान और कुर्बानी देने वाले महापुरुष हैं। न जाने कितने धैर्य धारण के बाद आज हाथों में हाथ धरने को मिला है। कितने दिन-महीनों की कुर्बानी के बाद ये क्षण नसीब हुआ है । तो थोड़ी और कुर्बानी जो आज मच्छर मांग रहा है उसे तो खुशी खुशी दे ही देंगे। इसीलिए न खुद डिस्टर्ब होना मंज़ूर न मच्छर को डिस्टर्ब करना मंजूर। दोनों बराबर शिद्दत से लगे हुए हैं। लेकिन इस प्रेम में साइलेंट डिस्टर्बिंग ध्वनि कहीं न कहीं माशूका को दस्तक दे ही देती है। उनके महसूस करने की शक्ति हमसे ज्यादा है। बिना कुछ कहे एक सुगंधित हवा का बड़ा छोटा सा परंतु तीव्र झोंका आता है जो मच्छर को उसकी विलासिता से विमुख कर दूर भगा देता है। जब तक कुछ समझ पाता वो मुस्कुराते हुए बोली "इत्ता नशा भी ठीक नहीं"।  तब समझ में आया वो हवा का झोंका उनके शुभ मुखश्री से निकला है। तभी सुगंधित भी है।


बस यूं समझिए जीवन जीने का मोक्ष मंत्र उन्हीं लम्हों में प्राप्त कर लिया था। आज भी तन्मयता से उसका पालन कर रहा हूँ। परिणाम है कि जीवन में आज भी वो किसी ऐसे मच्छर को फटकने नहीं देती हैं जो मुझे डिस्टर्ब करे। क्योंकि वो भी शिद्दत से चाहती हैं कि उनका हाथ हमेशा मेरे हाथों में रहे। मुझे कोई डिस्टर्ब न करे। क्योंकि अगर मैं डिस्टर्ब होता हूँ और उनसे उसका जिक्र भले ही न करूँ उस साइलेंट डिस्टर्बिंग  ध्वनि की दस्तक उन तक पहुंच ही जाती है। जिससे वो भी डिस्टर्ब हो ही जाती हैं। फिर वो सुगंधित हवा का झोंका आता है और जीवन के सारे कष्टों को उड़ा ले जाता है।

Comments

  1. असीम आनंद की अनुभूति हो रही है ।

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  2. Hahaha..... Machhar waala sahi tha🤣🤣

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  3. शीर्षक के अनुरूप ही दूसरा अंतिम पारा कुछ ज्यादा ही आनंददायक था।

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    1. पढने और टिपप्णी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ..

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  4. आप अच्छा लिखते है अखिलेश सर

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