जिम्मेदार कौन?

 

      ईश्वर और प्रकृति दोनों मीमांसा का विषय हैं। लेकिन दोनों में बड़ा स्पष्ट अंतर सामान्य व्यक्ति को भी आभास होता है। ईश्वरीय अस्तित्व प्रत्यक्ष या परोक्ष का विषय हो सकता है ।आस्था-अनास्था का विषय हो सकता है आस्तिक-नास्तिक होने का विषय हो सकता है। परंतु प्रकृति प्रत्यक्ष होती है केवल व्यक्ति वरन कोई भी जीव इस पर प्रश्न नहीं उठा सकता है इसके अस्तित्व का किसी आस्था, विश्वास या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है।  इसी कारण सबसे ऊपर प्राकृतिक अस्तित्व होता है।  अपनी धारणाओं में मनुष्य ने इसीलिए शायद प्राकृतिक सिद्धांत को और प्राकृतिक न्याय को हमेशा तार्किक ढंग से ऊपर रखा है विद्वानों के एक समूह में यह धारणा भी है कि समस्त तत्व प्रकृति में ही विद्यमान हैं। इससे परे चेतन-अचेतन का अपना आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व हो सकता है। परंतु प्रकृतिवादियों की एक चुनौती उन सभी धर्म गुरुओं और वैज्ञानिकों के लिए है कि इनके द्वारा बताई गई बातें प्रकृति से परे नहीं होती यदि इनको अपने धर्म, ईश्वर या वैज्ञानिक ज्ञान और सिद्धांत पर इतना भरोसा है तो ऑक्सीजन के अतिरिक्त ऐसा कोई तत्व ईजाद कर दें जो प्राणी जगत के श्वसन में प्रयोग की जा सके कहने का आशय यह है कि जो कुछ भी प्रकृति में है उसे केवल खोजा जा सकता है।  उसे प्राप्त करने का आविष्कार किया जा सकता है परंतु प्रकृति के बाहर से कोई ऐसी चीज नहीं उत्पन्न की जा सकती है इसी प्रकार जिन भी चीजों को हम जानते हैं उनका केवल स्वरूप और नाम एवं जानने का समय अलग अलग हो सकता है।  परंतु विद्यमान वह पहले से ही है और भविष्य में भी रहेगी। इसलिए प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को किसी भी निर्णय में सबसे ऊपर रखना चाहिए चाहे यह निर्णय किसी व्यक्ति या समूह द्वारा व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या किसी भी स्तर पर लिया जाए अन्यथा प्रकृति अपने को संतुलित करना बेहतर तरीके से जानती है। उपरोक्त तथ्य से सहमति ज्यादातर लोग रखेंगे।  परंतु जब निर्णय की बारी आती है तो जाने क्यों इस अवधारणा को दरकिनार कर दिया जाता है स्वार्थपरता हावी हो जाती है।  यह केवल विश्व स्तर पर परिलक्षित होती है वरन एक ही देश के भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों और सरकारों के निर्णय में भी दिखाई देता है अपने निर्णय और नीतियों को येन केन प्रकारेण सही साबित करने के सारे तर्क, चाहे उस पर आम लोगों का विरोध ही हो, दिए जाते हैं।  वैसे भी राजनेता और जनप्रतिनिधि को जाने क्यों भारत देश में यह सारे तर्क वितर्क और निर्णय लेने की मनमानी छूट है एक आम धारणा यह भी है कि भारतीय संविधान में किसी राजनैतिक पद के लिए किसी शिक्षा और शैक्षिक डिग्री की अनिवार्यता नहीं है।  परंतु आजादी की लगभग 75 वर्षों बाद कुछ तो संविधान संशोधन इस दिशा में किया जा सकता है यदि वह संभव नहीं भी है तो राजनीतिक दल अपने स्तर पर ही इस प्रकार के कुछ मानक बनाने के लिए स्वतंत्र है वैसे इस व्यवस्था पर निर्णय सरकार से ज्यादा राजनीतिक दल से ही अपेक्षित है क्योंकि राजनीतिक दलों से ही सरकारों का निर्माण होता है

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       खैर, यदि वर्तमान स्थिति पर नजर दौड़ाई जाए तो देश के विकसित होने एवं प्राकृतिक न्याय की विफलता का सबसे ज्यादा श्रेय ऊपरी नौकरशाही को दिया जाना चाहिए सबसे विद्वत वर्ग, जिसको अंग्रेजों ने तैयार किया था, वही है। भारतीयता से ज्यादा अंग्रेजियत का पुट आज भी उस में मिलता है। अंग्रेजों का अपना अलग उद्देश्य था।  उन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उनकी अपनी नीतियां हुआ करती थीं। जो अधिक मात्रा में भारतीयों के लिए शोषणकारी और अंग्रेजी सरकार एवं अंग्रेज नौकरशाहों के लिए हितकारी और फायदेमंद होती थीं।  उनकी नीतियों में भारत देश में टिकाऊ व्यवस्था और प्राकृतिक न्याय का कोई महत्व नहीं था हर दृष्टिकोण से उनका स्वयं का हित सर्वोपरि था यह बात अलग है कि चाहते हुए भी उनके कुछ कृत्यों से भारतीय भी लाभान्वित हुए।  इसीलिए उनके नौकरशाहों द्वारा स्वयं की जरूरत और लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार को शोषणकारी नीतियां बनाने में सलाह एवं सहयोग प्रदान किया जाता था भले ही वह प्राकृतिक न्याय के विपरीत होते। परंतु भारतीय होने के नाते भारतीय विद्वत नौकरशाही, जो भारतीय धरा पर सबसे ज्यादा बौद्धिक संपन्न मानी जाती है, सरकार को सही सलाह देने में विफल रही है और आज भी है कैसे ? भारत आजाद हुआ 1947 में चीन आजाद हुआ 1949 में। जापान उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध की त्रासदी झेलकर निकला 1949 में ही इजराइल को मान्यता मिली आज भारत का हर पढ़ा लिखा व्यक्ति इन देशों की तरक्की से परिचित है।  इसका मुख्य कारण क्या है कि यह सारे राष्ट्र आज विश्व पटल पर विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़े हैं और हम आज भी विकासशील देश का ठप्पा लिए पूरी दुनिया में घूम रहे हैं?

       माना कि भारत देश में जाति, धर्म ,भाषा, क्षेत्र, भाई - भतीजावाद जैसी तमाम समस्याएं विद्यमान हैं। राजनेता राजनीतिक मजबूरियों के तले दबे राजनीति कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं यह निश्चित रूप से समझदार तो थे।  परंतु इनकी समझदारी किसी निश्चित परिधि तक ही सीमित रही और आज भी सीमित है।  ऐसी दशा में सरकार को सलाह देना और उचित सलाह देकर संकुचित मानसिकता और  परिधि के बाहर निकाल कर सही नीतियों का निर्माण एवं क्रियान्वयन करवाना आखिर किस का उत्तरदायित्व होना चाहिए ?

      परंतु देखा यह जा रहा है कि भारतीय धरा पर सर्वाधिक बौद्धिक संपन्न व्यक्ति भी आज संकुचित सोच के साथ तालमेल ठीक करने में लगा है।  उसको भी राजनीति ने ऐसा घेर लिया है कि उसकी स्वयं की प्रतिष्ठा बचाने के लिए जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, भाई-भतीजावाद के छत्र तले शरण लेनी पड़ रही है।  फिर ऐसी बौद्धिक संपन्नता पर प्रश्नचिन्ह तो लगाया ही जा सकता है। अनुरोध यही रहेगा कि कम से कम अब इसे बुरा मान कर इस पर विचार करें विचार कर अपनी बौद्धिक संपन्नता का परिचय दें अन्यथा बिना सुने समझे स्वतंत्रता पश्चात से आज तक भारत में भी प्राकृतिक न्याय की हत्या कर ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जो भविष्य में एक प्राकृतिक क्रांति को जन्म देगा। जिसके कारण का केंद्र बिंदु तथाकथित सर्वाधिक बौद्धिक संपन्न लोग होंगे और इसका ठीकरा उन्हीं के सिर पर फोड़ा जाएगा।

Comments

  1. बहुत-बहुत धन्यवाद मुझे ये पढ़ने को मिला
    बहुत खूब

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  2. Bahut badiya likha bhai. Aur civil services ki kamjori bhi shi pakdi. Samaj k sabse pade likhe log hai par career aur anpi narrow identity se bahar nhi aa paate.

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  3. नौकरशाह लोग जब राजनेता बनेंगे तो ये बाते संभव हो पाएंगी । बंशानुगत नेता ये बात नही समझ पाएंगे ।

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  4. Yogesh kumar.. GPA DhanipurFebruary 18, 2023 at 8:01 PM

    Great sir🙏
    How thoughtful the blog is !

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