अनुकरणीय अग्रज
बैठ जाता है खुद ही जमीं पर
स्वाभिमान के साथ
सामने वाले का अभिमान बचा लेता है,
रिश्तों की उठा पटक से पहले
रिश्तों का सम्मान बचा लेता है ।
हम समझे उसे कम औकात का भले
हर बात में सबका अपमान बचा लेता है ।
बहुत बड़ी बड़ी बातें करतें हैं सब नादां
कहीं छोटा न समझ बैठे कोई खुद को
इसलिए सबसे अपना ज्ञान छुपा लेता है ।
रिश्तों की उठा पटक.....
उड़ते हैं हवा में सब भूलकर फकत
याद आता है वो जब आती है आफत
क्या फर्क कौन क्या कहता है
फ़िक्र है उसे जो भी घर में रहता है
खुद में गम के सारे तूफान समा लेता है ।
रिश्तों की उठा पटक.....
टूटते संस्कारों के इस दौर में
जब लोग अपना देखते हैं किसी और में
सौभाग्य है अपना अपने में मिले
संस्कारों का फिर से दौर चले
तू तो संस्कारों को भी महान बना देता है |
बैठ जाता है खुद ही जमीं पर
स्वाभिमान के साथ
सामने वाले का अभिमान बचा लेता है,
रिश्तों की उठा पटक से पहले
रिश्तों का सम्मान बचा लेता है ।
अति सुंदर....!!!!!👌
ReplyDeletethanx
DeleteKavi ji ki jai ho
Delete🙏🙏🙏🙏
DeleteVery nice sir 👌👌
ReplyDeletethnk u
Delete👌👌
ReplyDeletethank you very much
DeleteBahut hi sundar pankti kahi hai apne mahasay ji (NIKKU😁👌👌)
ReplyDeleteNikki bhaiya धन्यवाद
DeleteVery nice 👌
ReplyDeleteथैंक यू।
Deleteरचना करने के लिए बधाई,
ReplyDeleteधन्यवाद
Deleteवाह वाह वाह
ReplyDeleteअग्रज आलोक द्विवेदी
Deleteअति सुंदर पंक्तियां।
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteअति सुन्दर प्रस्तुति
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteबहुत ही शानदार पंक्तियाँ सर
ReplyDeleteBhanu bhaiya dhanywad..
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteNice lines...
ReplyDeleteThnx
Delete🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteBahut acche Akhilesh..
ReplyDeletePankaj bhai dhanywaad
Delete🙏🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteNice
ReplyDeleteThanku
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