अनुकरणीय अग्रज

 


बैठ जाता है खुद ही जमीं पर

स्वाभिमान के साथ 

सामने वाले का अभिमान बचा लेता है,

रिश्तों की उठा पटक से पहले

रिश्तों का सम्मान बचा लेता है ।


हम समझे उसे कम औकात का भले

हर बात में सबका अपमान बचा लेता है ।

बहुत बड़ी बड़ी बातें करतें हैं सब नादां

कहीं छोटा न समझ बैठे कोई खुद को

इसलिए सबसे अपना ज्ञान छुपा लेता है ।

रिश्तों की उठा पटक.....


उड़ते हैं हवा में सब भूलकर फकत

याद आता है वो जब आती है आफत

क्या फर्क कौन क्या कहता है

फ़िक्र है उसे जो भी घर में रहता है 

खुद में गम के सारे तूफान समा लेता है ।

रिश्तों की उठा पटक.....


टूटते संस्कारों के इस दौर में 

जब लोग अपना देखते हैं किसी और में 

सौभाग्य है अपना अपने में मिले

संस्कारों का फिर से दौर चले 

तू तो संस्कारों को भी महान बना देता है | 


बैठ जाता है खुद ही जमीं पर

स्वाभिमान के साथ 

सामने वाले का अभिमान बचा लेता है,

रिश्तों की उठा पटक से पहले

रिश्तों का सम्मान बचा लेता है ।

Comments

  1. अति सुंदर....!!!!!👌

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  2. Bahut hi sundar pankti kahi hai apne mahasay ji (NIKKU😁👌👌)

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  3. रचना करने के लिए बधाई,

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  4. Replies
    1. अग्रज आलोक द्विवेदी

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  5. अति सुंदर पंक्तियां।

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  6. अति सुन्दर प्रस्तुति

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  7. बहुत बहुत धन्यवाद

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  8. बहुत ही शानदार पंक्तियाँ सर

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  9. This comment has been removed by the author.

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